
राजा कृष्णदेवराय के दरबार में तेनाली रामन अपनी बुद्धिमानी और चतुराई के लिए बहुत प्रिय थे। राजा ही नहीं, बल्कि दरबार के कई लोग उनकी प्रशंसा करते थे। लेकिन कुछ ब्राह्मण, जिनमें राजपुरोहित भी शामिल थे, तेनाली की बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्या करने लगे।
उन्होंने तेनाली को अपमानित करने की एक चाल चली। वे उसके पास गए और दिखावे के लिए कहा कि वे उसे अपना शिष्य बनाना चाहते हैं। तेनाली उनकी मंशा समझ गया, लेकिन फिर भी शांत भाव से उनकी बात मान ली। ब्राह्मणों का असली इरादा था कि कुछ समय बाद उसकी जाति का बहाना बनाकर उसे सबके सामने ठुकरा दिया जाए और उसका अपमान किया जाए।
जब वह दिन आया, ब्राह्मणों ने तेनाली को शिष्य मानने से इनकार कर दिया। तभी तेनाली रामन ने अपनी बुद्धि से ऐसा उत्तर दिया कि उनकी चाल उन्हीं पर उलटी पड़ गई। उसने समझदारी से यह साबित कर दिया कि ज्ञान और योग्यता किसी जाति से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण और बुद्धि से पहचानी जाती है।
राजा कृष्णदेवराय को सच्चाई समझ आ गई और उन्होंने तेनाली की सराहना की, जबकि ईर्ष्यालु ब्राह्मण शर्मिंदा हो गए।
यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि आत्मसम्मान बनाए रखना बहुत ज़रूरी है, अन्याय के सामने चुप नहीं रहना चाहिए, और सच्ची बुद्धिमानी हर तरह के भेदभाव से ऊपर होती है।