

धर्मचक्र प्रवर्तन कक्षा 8 हिंदी की एनसीईआरटी संक्षिप्त बुद्धचरित पुस्तक का चौथा अध्याय है। इस पाठ में भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश, धर्मचक्र प्रवर्तन, मध्यम मार्ग, चार आर्य सत्य तथा अष्टांगिक मार्ग के प्रचार का विस्तृत और प्रेरणादायक वर्णन किया गया है। इसमें बुद्ध का काशी (सारनाथ) आगमन, पाँच भिक्षुओं को प्रथम उपदेश देना, धर्मचक्र प्रवर्तन, अनेक शिष्यों को दीक्षा प्रदान करना, काश्यप मुनि और उनके अनुयायियों का बौद्ध धर्म स्वीकार करना, मगधराज बिंबिसार को उपदेश देना, उपतिष्य (सारिपुत्र) और मौद्गल्यायन का शिष्य बनना, अनाथपिंडद द्वारा जेतवन विहार का निर्माण तथा कपिलवस्तु में पिता राजा शुद्धोदन से मिलन जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
इस अध्याय के माध्यम से विद्यार्थी भगवान बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश, बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों, चार आर्य सत्यों, अष्टांगिक मार्ग तथा मानव जीवन में करुणा, संयम और आत्मज्ञान के महत्व को समझते हैं। यह पाठ सिखाता है कि अज्ञान, मोह और तृष्णा ही दुःख के कारण हैं तथा सम्यक दृष्टि, सम्यक आचरण और सम्यक विचार अपनाकर जीवन में शांति, सद्भाव और मोक्ष की दिशा प्राप्त की जा सकती है। साथ ही यह अध्याय सेवा, त्याग, समानता, सहिष्णुता और लोककल्याण की भावना को भी सुदृढ़ करता है।
यह पाठ विद्यार्थियों में ऐतिहासिक समझ, नैतिक मूल्य, आत्मचिंतन, विश्लेषणात्मक सोच, सांस्कृतिक जागरूकता, भाषा-कौशल, तार्किक चिंतन तथा सामान्य ज्ञान का विकास करता है। साथ ही यह भगवान बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन, बौद्ध दर्शन, चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हुए कक्षा 8 हिंदी, एनसीईआरटी एवं विद्यालयी परीक्षाओं की प्रभावी तैयारी में सहायता करता है।